किरदार!

आमूमन rajiv chowk मेट्रो स्टेशन passengers से खचा-खच भरा रहता है| मंज़िल पे जल्द से जल्द पहुँचने की दौड़ में इस कदर धककेबाज़ी होती है कि मानो दिल्ली शहर की ये आखरी मेट्रो हो| बहराल! एक दोस्त से मिलने के लए आज का दिन मुक्कर्र हुआ था| एक ज़िम्मेदार भारतीय नागरिक की तरह वो लेट था| मैने वहीं platform पर ही उसका इन्तेज़ार करने का तय किया| Seats भरी थी तो वहीं नीचे ज़मीन पर बैठ गयी|

Image Courtesy - Google

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सामने platform पे मेट्रो रुकती, लोग उतरते, चड़ते, guard उस दरवाज़े को manually बंद करता जो चलने से पहले ऑटोमॅटिक क्लोज़ होता है| उन लोगों को देख के मैं कहीं रावी पार के किरदार ढूँडने लगी तो कहीं पिंजर के पूरो और रशीदा को| कुछ मुझे प्रेमचंद और मंटो की कहानियों के किरदारों से लगे| फिर एहसास हुआ की मैं भी तो एक किरदार हूँ| खुदा की बनाई उस कहानी का जिसे मुक्कम्मल करने के लिए खुदा ने सिर्फ़ मुझे चुना|
हम सब किरदार हैं खुदा की बनाई उन अनगिनत कहानियों का जिन्हे मुक्कम्मल एक अंजाम देने के लए खुदा ने हमे चुना और भेज दिया दुनिया के रंगमंच पर|  जिस तरह कमानी,मेघदूत, श्री राम सेंटर, IHC के ओपन थियेटर मे simultaneously plays चलते रहते हैं| उसी तरह हम सबकी कहानियाँ simultaneously चलती जा रही हैं|  हर वो जगह जहाँ हम जाते हैं एक सेट का सीन है| वो सभी लोग जिन्हे हम अपनी ज़िंदगी मे मिलते हैं, हमारी कहानी के किरदार हैं| कोई तवज्जुह दे ना दे, अपनी कहानी के protagonist  हम खुद ही  तो हैं| फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि थियेटर की performances के बाद किरदार अपनी acting की आलोचना याँ प्रशंसा सुन लेते हैं और अगली बार अच्छा प्रदर्शन देते हैं|  मगर खुदा की कहानी मे अगली बार नही आती| कोई रीटेक नही होता| इसलिए अपने हिसाब से जीलो इसे| कल किसने देखा है? वो कहते हैं ना “सुनो सबकी, पर करो अपने मन की”. 🙂

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बेरुखी!!

ज़िन्दगी कुछ पेचीदा सी होती जा रही है,
गैरों से नज़दीकियां, और
अपनों से दूरीयां बढ़ती जा रही हैं|_DSC0313 copy

कल तक जो रिश्ते आँखों में सितारे बन के चमकते थे,
आज उनकी बेरुखी, बादल बन के आँखों में छाई है|

आसमान में बादल, और आँखों में बदल,
इस बात पर अड़े हैं कि पहले कौन बरसेगा|
दिल दुआ करता है कि दोनों साथ में बरसें ,
रोने का किसी को पता नहीं चलेगा|

ज़िन्दगी ग़मगीन नहीं उन रिश्तों के बिना,
मगर एक खलिश सी है|
आखरी अलविदा जब कहेंगे हम सबसे,
कितने अधूरे रिश्तों का बोझ साथ में ले जाएंगे|

ज़िन्दगी कुछ पेचीदा सी होती जा रही है,
गैरों से नज़दीकियां, और
अपनों से दूरीयां बढ़ती जा रही हैं|

The myriads of blessings!

Thoughts keep hitting the walls of wandering mind. Mind tries to contemplate the wandering thoughts. Day by day life keeps passing and we are trapped in a web spun by ourselves with our daily trifles. Today was one such day, when I found myself trapped in the web of my own thoughts. Surroundings seemed gloomy.Even the chirping of birds, blowing wind, sky, trees could not change my low-spiritedness. It was a moment of extraordinary poignancy.

Life is BEAUTIFUL!

Life is BEAUTIFUL!

Sitting on the seat at the platform of Rajendra place metro station, engrossed in thought to solve the problems of perplexed life,  a man with his white cane standing on the opposite platform caught my attention. All worries, all thoughts vanished from my mind and my eyes stopped at him. He was trying to walk with the help of his hoover cane but seemed little hesitant in walking. Then a man, a Metro employee, approached him, held his hands and dropped him to the lift. I was back to my senses, thinking about the myriads of blessings that have been bestowed on us by Thee. I am blessed with beautiful eyes to see the beautiful world around me. Yet, I was so depressed by the things which I don’t have. In our lives, we ignore what we have and keep worrying about what we don’t have. I took a deep breath and thanked God for all the blessings thy has bestowed on me.

No matter, how tough or easy Life is. Life is beautiful!